मॉर्केटिंग-युग में एक मौन चित्रकार

दिनेश चौधरी
भारत के मध्यभाग में नैनपुर नाम का छोटा-सा कस्बा कभी एशिया का सबसे बड़ा जंक्शन स्टेशन हुआ करता था। यह रेलवे की छोटी लाइन का स्टेशन था। रेलगाड़ियों के इन छोटे डिब्बों पर चलना अद्भुत-अनोखा अनुभव हुआ करता था। आस-पास खूब घने जंगल हुआ करते थे, जिनके बीच से इन रेलगाड़ियों से गुजरने के आनंद को बयान नहीं किया जा सकता। यहीं पास में कान्हा-किसली भी है, जहाँ आप शेरों को घूमते हुए देखने का आनन्द ले सकते हैं। देश-विदेश से पर्यटक यहाँ आते हैं। जिस चित्रकार का जिक्र मैं करने जा रहा हूँ, वे इसी इलाके से हैं।
कैनवास से गर्द झाड़ने की कवायद चल रही थी, हालांकि इन्हें बड़े जतन से लाया गया था। एक लैंडस्केप में एक मित्र को कुछ धब्बा-सा नजर आया और वे उसे निकालने की असफल कोशिश कर रहे थे। इस बीच चित्रकार आ धमके और बताया कि धब्बा है नहीं, बनाया गया है। पत्तियों में कई बार कीड़ों के लगने से इस तरह के धब्बे बन जाया करते हैं और यह भी जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। 
यह एक चित्र प्रदर्शनी से पहले की घटना है। चित्रों को देखकर आलोचक ने कहा, “चित्रकार अति यथार्थवादी है।” 
यथार्थ तो यथार्थ होता है, ‘अतियथार्थ’ अपने पल्ले नहीं पड़ता। यह जितना होता है, उसे बस उतना ही होना है, न कुछ कम न थोड़ा ज्यादा। जैसे ही आपकी कल्पना ने इसमें दखल दिया, वह आपके हाथ से निकल जाएगा।शायर कहता है, ” सच घटे या बढ़े तो सच न रहे/ झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं।” लेकिन आलोचक तो आलोचक होता है और शास्त्रों के अनुसार उसकी जगह सदैव रचनाकार से ऊपर होती है। हालांकि कहा यह जाता है कि आलोचना हमेशा रचना से छोटी होती है।
ऐसा नहीं है कि एस. राम नाम का यह चित्रकार सिर्फ मूर्त चित्रण में लिप्त रहता है। वे अमूर्त भी गढ़ते हैं, जिनमें फकत बिम्बों वाली बारीक जटिलता नहीं होती, सौंदर्य से परिपूर्ण सुविचारित कल्पना होती है और उन नजरों को भी भली लगती है जिनका अमूमन इस फ़न से कोई लेना-देना नहीं होता। 
कोई महत्वाकांक्षा नहीं है।अल्पभाषी हैं। कई बार लगता है कि जितनी जरूरत हो उतना भी नहीं बोलते। प्रशंसा करने पर असहज हो उठते हैं। रचनाकार तो रचनाओं पर प्रतिक्रिया चाहता है न! और नहीं चाहिए तो बनाने की जरूरत ही क्या है? पर यह सवाल उन्हीं से पूछा जाए तो जवाब में एक लंबी चुप्पी साध लेंगे।
उम्र में बड़े हैं मुझसे, पर मुझे ‘बाबूजी’ कहते हैं। पहली बार मिले थे तब भी दोनों हाथ जोड़कर यही कहा था। खाकी पतलून के ऊपर सफेद शर्ट पहन रखा था।ज्यादातर यही पहनते हैं। कोरे कैनवास और अपनी सादगी के अनुरूप यह सादा रंग ही उन्हें आकर्षित करता होगा। तब रेलवे के एक कमरे वाले क्वार्टर को उन्होंने अपना स्टूडियो बना रखा था। उसी प्रदर्शनी की तैयारी चल रही थी, जिसका जिक्र मैंने शुरुआत में किया है। यहाँ बहुत सारे चित्रों को बनते हुए देखने का अवसर मिला।
एक तुड़ी-मुड़ी नोट बुक उनके हाथों में होती थी। नोटबुक जितनी तुड़ी-मुड़ी थी, उससे ज्यादा उनके स्केच तुड़े-मुड़े होते थे। देखकर समझना तो दूर, अंदाजा लगाना भी मुश्किल होता था। शॉर्टहैंड वाले अपने लिए इसी तरह नोट्स बनाते होंगे। लेकिन जैसे-जैसे उनका काम बढ़ता जाता, वैसे-वैसे ये अबूझ आकृतियाँ स्पष्ट होने लगतीं। विषय भी कितने सादे होते थे, जैसा उनका अपना जीवन है।
टेसू के फूलों से लदी एक शाख है। बस यही है और कुछ नहीं है, पर रंग ऐसे हैं कि वह समूचा उत्सव आँखों के आगे झलकने लगता है, जो इन फूलों के लदने के साथ ही आने वाला है। भैंस तो कतई सौंदर्य का प्रतिमान नहीं हो सकता, लेकिन उनकी एक और पेंटिंग जो मेरी आँखों के आगे बनकर तैयार हो रही है, उसमें केंद्रीय तत्व यही है। कुछ भैंसे हैं, जो चर रही हैं। पार्श्व में नदी नहीं, जंगली नाला है और थोड़ी उबड़-खाबड़ जमीन। पेड़ के नाम पर शायद ठूँठ ही हैं। चरती हुई काली भैंसों की पीठ पर सफेद बगुले विराजमान हो गए हैं। पता नहीं आपने कभी ऐसा दृश्य देखा या नहीं। इस पेंटिंग को देखने के बाद मैंने सायास देखा कि सचमुच चरती हुई भैंसों की पीठ पर बगुले आकर बैठ जाते हैं। शरद जोशी ने इस पर एक व्यंग्य भी लिखा है।
एक पेंटिंग अब भी घर की दीवार पर टँगी है, बैगा जनजाति के ग्रामीणों पर। गाँव की एक झोपड़ी के पास लकड़ियाँ जलाई गई हैं। जाड़ों की रात है। एक नवयुवक मौका देखकर पसर गया है। दूसरा बैठे-ठाले ही नींद की झोंक में है। दिन भर के श्रम के बाद यह शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। तीसरा बीड़ी का सुट्टा मार रहा है। चौथे की बीड़ी अभी सुलग भी नहीं पाई है, जिसके लिए एक अन्य शख्स जलती हुई लकड़ी से एक तीली निकालकर उसकी मदद कर रहा है और यह साबित कर रहा है कि बीड़ी जलाने के लिए सचमुच ही आग की जरूरत होती है और वह जिगर की आग से नहीं जलती। इतने सारे लोगों के बीच थोड़ी जगह रह गयी है और ठंड सिर्फ इंसानों को नहीं लगती, इसलिए मौका देखकर एक कुतिया भी यहीं आकर पसर गयी है। पेंटिंग बहुत डार्क है और ठीक-ठाक रोशनी की व्यवस्था की जाए तो ऐसा लगता है कि जलती हुई लकड़ी की रोशनी फूटकर कमरे में फैल रही है। लकड़ी के पिछले हिस्से से कुछ धुँआ भी उठ रहा है।
एस. राम नैसर्गिक कलाकार हैं। कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है, न ही किताबी तालीम हासिल की है। लेकिन उनकी दृष्टि बहुत तीक्ष्ण है। चीजों को बड़ी बारीकी से देखते हैं। पूजा के किसी उत्सव में उनसे झाँकी बनाने का आग्रह किया गया तो उन्होंने कृश्न चन्दर की मशहूर कृति ‘दादर पुल के बच्चे’ के सभी बच्चों को ला खड़ा किया। ये बच्चे शायद अब भी उसी अवस्था में हों और इनके नाम पर ग्रांट लेने वाली गैर सरकारी संस्थाएँ अब जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गई होंगी।
संयोग से एस. राम को थोड़े अरसे के लिए चित्रकार अनादि का भी सानिध्य हासिल हुआ। पता नहीं इस नाम से आपकी वाक़िफियत है या नहीं। मण्डला जिले के नैनपुर में इनकी एक मशहूर कृति व्यस्तम चौराहे पर स्थापित है और इसे ‘बाँसुरी वादक चौराहा’ के नाम से जाना जाता है। अनादि बंगाल के पांसकुड़ा या शायद मेचेदा नामक जगह से आए थे। महर्षि अरविंद से प्रभावित थे। किसी गाड़ी में सवार होकर मुम्बई वीटी पहुँच गए और रेलवे स्टेशन के गेट में टीसी को दिखाने के लिए उनके पास ट्रेन की टिकिट के बदले कुछ तुड़े-मुड़े स्केच ही थे। टीसी भला आदमी था। उनसे हुज्जत करने के बदले उन्हें टाइम्स ऑफ इंडिया के दफ्तर में छोड़ आया। अनादि यहाँ काफी समय तक बतौर आर्टिस्ट काम करते रहे। फिर न जाने क्या हुआ कि घने जंगलों से घिरे नैनपुर आए तो यहीं के होकर रह गए। अपने आखिरी दिनों से पहले तक, जब उन्हें नागपुर के मानसिक आरोग्य अस्पताल में दाखिल करना पड़ा था, वे नैनपुर में ही रहे। यहाँ उनका एक आश्रम भी हुआ करता था, जो अब न जाने किन हालात में है।
अनादि की तरह एस. राम चुपचाप अपनी साधना में लीन हैं। जमाना उनकी परवाह नहीं करता और वे जमाने की। अग्रज मित्र चन्द्रशेखर ने अपने पैसे फूँककर उनकी एक आर्ट गैलरी तैयार की है। यहाँ “मृत्यु से संवाद” नामक एक विशालकाय भित्ति-चित्र उन्होंने तैयार किया है। चित्र सफेद पर्दे से ढँका रहता है। पर्दा खुलने पर आँखे चौन्धिया जाती हैं। रंगों का संयोजन और परिकल्पना अद्भुत है, जिसे देखकर ही महसूस किया जा सकता है। इसके वर्णन की कूवत अपने पास नहीं है। 
फैज की मशहूर पंक्तियाँ हैं, ” वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं..।” उस सहर के अंधेरों को आप अपनी आँखों से शायद ही देख पाए हों। एस. राम की पेंटिंग में उस अकेली औरत की आँखों में झाँके और देखें कि अंधेरा कितना स्याह है!

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