चाँद से ज़मीं चाँद से खूबसूरत नज़र आती है – दिनेश चौधरी



वह 1969 के साल में जुलाई महीने की 16 वीं तारीख थी। शाम के 7 बजकर द्धण् मिनट हुआ चाहते थे। उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी।। 9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1 और 0……………………………. विस्फोट हुआ १ लगा कि जैसी जमीन हिल गई हो।

तेज, बहुत तेज आवाज के साथ अपोलो 11 आसमां के रास्ते अंतरिक्ष की ओर बढ़ चला था और इस ऐतिहासिक, विस्मयकारी आवाज को मैंने बगैर किसी रुकावट के एशिया के तकरीबन बड़े हिस्से में कोई डेढ़ मिनट तक गूँजने दिया। इस आवाज के गुम हो जाने के बाद भी देर तक मेरे कानों में सनसनाहट गूँजती रहीइसके बाद मैंने कुछ गानों की झलकियाँ बजाईं, जिसमें हर दूसरी पंक्ति में चाँद का जिक्र था।

कहना मुश्किल है कि हिंदी के कवियों गीतकारों ने चाँद पर ज्यादा रचनाएँ की हैं या उर्दू के शायरों ने। उस शाम से पहले चाँद को लेकर जो भी गीत, ग़ज़ल, कव्वालियां रही होंगीस मैंने उनके रिकॉर्ड्स खँगाल लिए थे। तब मुझे भी नहीं पता था कि ये इतनी ज्यादा तादाद में होंगे, पर मुझे इन सब की जरूरत थी। चाँद को लेकर ढेर सारी उपमाएँ हैं, पर सबसे ज्यादा वही मेहबूब वाली थी। इधर कला और विज्ञान में होड़ मची थी। विज्ञान चाँद के कदम चूमने जा रहा था और शायरी चाँद को मीलों पीछे छोड़कर सितारों के रास्ते में थी। मैं इनके बीच कहीं लटका हुआ था और अपोलो 11 के छूट पड़ने की गर्जनदार आवाज अब भी कानों में गूंज रही थी। अभी इस रोमांच से उबर भी न पाया था कि डायरेक्टर जनरल नेविल जयवीरा कागजों का एक पुलंदा हाथ में थामे नमूदार हुए। अमूमन शांत सौम्य रहने वाले जयवीरा साहब उत्तेजना से थरथरा रहे थे। कहा, मनोहर पूरी दुनिया से कोई तीन सौ से भी ज्यादा टेलीग्राम, कैबल्स आ चुके हैं। मशीनें अब भी खड़खड़ा रही हैं। क्या हम इंसान के चाँद पर कदम रखते तक लाइव कॉमेंट्री जारी नहीं रख सकतेरु केन यू डू इट मैंने हामी भर दी। वापसी का कोई रास्ता भी तो नहीं था१ यह बला खुद मैंने ही मोल ली थी।
रेडियो सिलोन पहुँचने के बाद वहाँ बहुत सारा समय कैंटीन में ही गुजरता था। इस बीच भारतीय दूतावास के एक सांस्कृतिक प्रतिनिधि से दोस्ती हो गयी। वे सरदारजी थे। निजी उपयोग के लिए उन्हें बहुत(सी चीजें तयशुदा कोटे से मिलती थीं। इनमें शराब और सिगरेट भी थी। शराब वे अपने लिए रख लेते और सिगरेट मुझे थमा जाते। कहते, ुइन्हें किसी को थमा देना।ू थमाने के लिए मैं किसे ढूँढ़ता फिरतारु खुद ही फूँकने लगा। लत लग गई। इसी लत की जद में मैं कैंटीन में बैठा हुआ अपने ही कामों की चीरफाड़ कर रहा था। सोचा कि डेढ़(दो बरस यहाँ सिवाय फिल्मी गाने बजाने(सुनने के अलावा मैंने किया क्या हैरु अब तक मैं दो चाय पी चुका था और दो सिगरेट फूँक चुका था। तीसरी सिगरेट के साथ दिमाग की बत्ती भी जल उठी१
इंसान के चाँद पर जाने की तैयारियों की खबर रोज अखबारों में आ रही थी। मैं इन खबरों को लगातार बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ रहा था। पता नहीं कौन(सी अंतःप्रेरणा थी कि बिना किसी मकसद के इनकी कतरनें निकाल कर फाइल करता जा रहा था। गाहे(बगाहे ुवॉयस ऑफ अमेरिका भी सुनता और उनकी अबूझ(सी बोली को बूझने का जतन करता। इस बीच यह खबर भी मिली कि कोलंबो की अमेरिकन काउंसलेट नासा में चाँद तक उतरने की हर रोज की घटना का बुलेटिन एक दिन पहले जारी कर देगी। यह मेरे लिए बड़ी खबर थी। तीसरी सिगरेट के मसलने से पहले मैंने अपने इरादों को पक्का कर लिया और तय पाया कि आने वाले दिनों में होने वाली इस महत्वपूर्ण घटना की लाइव कॉमेंट्री हिंदी में की जानी चाहिए। मैंने अपने इरादों के बारे में वर्नन कोरिया साहब से बात की।

वे व्यावसायिक सेवाओं के निदेशक थे और आगे चलकर बीबीसी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। वे मुझे भी बीबीसी में एशियाई क्षेत्र का निदेशक बनाना चाहते थे, पर यह प्रसंग फिर कभी।
कोरिया साहब ने डायरेक्टर जनरल नेविल जयवीरा से बात की। उन्होंने जो सुना, उस पर यकीन ही नहीं हुआ। पहले तो उन्होंने इनकार ही कर दिया। हिंदी सेवा में कुल जमा चार(पांच लोग थे। तकनीकी ज्ञान सबका शून्य था। अंग्रेजी में हाथ थोड़े तंग थे। उन्हें समझ में नहीं आया कि यह कैसे होगा। उन्होंने मुझे तलब किया। मैंने बहुत धैर्य के साथ अपनी योजना बताई। जयवीरा साहब भारत में आईसीएस की परीक्षा पास कर चुके थे। आला दिमाग अफसर थे और चीजों को सुनने( समझने की सलाहियत थी। उन्होंने हरी झंडी दे दी।
रेडियो कॉमेंट्री करने का मुझे कोई खास अनुभव नहीं था। जसदेव सिंह से जरूर हॉकी की कॉमेंट्री सुना करते थे और वे दिल की धड़कनों को बेतरह बढ़ा देते थे। कभी(कभी थिएटर करते हुए उनकी कॉमेंट्री की नकल कर लिया करते थे। बस इतना ही१ पर अब उनका जिक्र निकल आया है तो उनसे मुलाकात का किस्सा सुनाता चलूँ। डिस्कवरी चैनलू वालों ने हिंदी प्रोग्राम की शुरुआत मेरी ही आवाज के साथ की थी। शुरुआती दिनों में यह काम सम्मानजनक था। फिर डबिंगु के काम में बहुत से बहुत से वेंडर्सु आ गए। ये शुद्ध रूप से बिचौलिए थे।

एक बिचौलिया काम लेकर दूसरे को थमाता, दूसरा तीसरे को और आर्टिस्ट की बारी सबसे आखिर में आती। जाहिर है कि काम की गुणवत्ता में फर्क तो आना ही था। तो चैनल से जुड़ी एक एजेंसी ने दिल्ली की एक मीटिंग में काम से जुड़े सारे लोगों को बुलाया। जसदेव सिंह को खासतौर पर आमंत्रित किया गया था, यह बताने के लिए कि ुबोलनाु क्या और कैसा होता हैरु वे अपने साथ डब की हुई आवाज के कुछ नमूने लेकर आए थे। एक(एक आवाज के टुकड़े चलाते और उसकी व्याख्या करते जाते। एक टुकड़ा चलाया और कहा, ूयह सुनिए१ ऐसा लग रहा है कि इन हजरात के पीछे कोई लाठी लेकर चल रहा है।।जल्दी बोलो वरना मार खाओगे। कुछ और टुकड़े चलाए और उनकी भी इसी तरह से धज्जियाँ उड़ा दीं। मैं मन ही मन सोच रहा था कि, यार१ मैं तो इन्हें भला आदमी समझता था पर ये कुछ और निकले।ु उनके प्रति मेरी श्रद्धा जरा कम होने लगी। फिर अगली आवाज सुनाई पड़ी। यह मेरी ही थी।

शेक्सपियर की किसी कहानी का प्रसंग था। जसदेव कुछ देर सुनते रहे। फिर कहा, अहा१ ये होती है वॉयसिंग१ बोलने वाला कहानी के मजे ले रहा है।।।ू मैँने उनके प्रति अपनी राय फिर से बदल ली। श्रद्धा वापस बहाल हो गई। चैनल वाले जानना चाह रहे थे कि प्रति घण्टे लाख(डेढ़ लाख खर्च करने पर भी उन्हें विवरण में गुणवत्ता क्यों नहीं मिल पा रही है। मैंने उन्हें बताया कि बाज़ार में बिचौलियों का कब्जा है। आपकी राशि कलाकार तक नहीं पहुँच रही है, उसका मेहनताना लगातार कम हो रहा है। एक सज्जन उखड़ गए। कहा कि आप दिहाड़ी मजदूर जैसी बात कह रहे हैं। मैंने कहा कि आपका रवैया भी तो मिल(मालिक जैसा है।
बहरहाल, चैनल की पिछली रिकॉर्डिंग में कुछ संशोधन करने थे तो मैं एजेंसी के स्टूडियो की ओर रवाना होने लगा। जसदेव भी आ गए। कहा, चलो मैं भी देखता हूँ कि डबिंग किस तरह होती है। मैंने उन्हें भी एक हेडफोन थमा दिया। मूल आवाज अंग्रेजी में थी, मुझे हिंदी करना था। यह आसान काम नहीं होता। वाक्य और शब्दों के सटीक भाव तो व्यक्त करने ही होते हैं, पिचु, पॉज़ु और लिप सिंकिंगु का भी ध्यान रखना होता है। जसदेव ने कहा, यार१ ये तो बड़ा मुश्किल काम है। कॉमेंट्री करना आसान है। इसी दौरान स्क्रिप्ट लिखने वाली एक मोहतरमा मुझे हिंदी सिखाने पर आमादा हो गईं। वे एक यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग की प्रमुख रह चुकी थीं। उनका कहना था कि मैंने अंडरवर्ल्डू का अनुवाद न करते हुए उसे अंडरवर्ल्डु ही क्यों कहा। उनकी राय थी कि मुझे पाताललोकू कहना था। इसी तरह वे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ाू के वाक्यांश पर ऐतराज कर रही थीं। वे शायद डिक्शनरी लेकर बैठी हुई थीं और रत्तीु की जगह ग्रामू शब्द चाहती थीं। मैं उन्हें कैसे समझाता कि अनुवाद शब्दों का नहीं, भावों का होता है। वे शायद उसी तरह कि हिंदीप्रेमी थीं, जो हकीकतन हिंदी के शत्रु होते हैं और मौका पड़ने पर रेलगाड़ीू और सिग्नलू को लौह पथ गामिनीू और आवक जावक सूचक यंत्रू कहना चाहते हैं। जसदेव सिंह इस बहस का पूरा मज़ा ले रहे थे और मंद(मंद मुस्कुरा रहे थे। यह डिसकवरीु के लिए मेरी आखिरी रिकॉर्डिंग थी। इसके बाद मैंने स्टारु वालों के लिए नैशनल जियोग्राफिकु के साथ काम शुरू कर दिया। मेरा पहला प्रोग्राम रेशम रोडू था जो खैबर दर्रे से होकर आने वाले आतताइयों के बारे में था।
रेडियो कॉमेंट्री का अब तक मेरे पास सिर्फ एक तजुर्बा था। छठवें पोप भारत होकर कोलंबो आ रहे थे। रेडियो सिलोन ने तय किया कि पोप के कोलंबो आगमन और उनकी धर्म(सभा ९मास० पर हिंदी सेवा की ओर से आँखों देखा हाल प्रसारित किया जाएगा। मेरी तैनाती हवाई अड्डे पर की गई, विजयलक्ष्मी जी को रास्ते को कवर करना था और दलबीर सिंह परमार को सभा(स्थल से विवरण देना था। हवाई अड्डे के कंट्रोल बूथ पर मैं दूरबीन लेकर खड़ा हो गया। मेरे साथ कमर्शियल सर्विसेस के विजयमाने साहब भी थे। शाम का वक्त था। दूर उफ़क पर एक सितारा(सा झिलमिलाया। फिर कुछ नूर(सा चमका। आगे यह रोशनी दो हिस्सों में बंट गई, जैसे दो आँखे आकाश से ज़मीं को निहार रही थीं। यह पोप का ही विमान था और मैं अपना विवरण इसी तरह से बेहद संजीदगी के साथ दिए जा रहा था। जितना मुमकिन हो सका, मैंने कोशिश की कि मैं जो देख रहा हूँ, वही अक्स सुनने वालों के भी जेहन में उभरे।पोप विमान से उतरे। लोगों का अभिवादन किया और उनका अभिवादन स्वीकार किया। स्वागत सत्कार हुआ। फिर वे धर्म सभा के लिए सभा(स्थल की ओर रवाना हो गए। मैंने राहत की साँस ली और कहा, अब आप आगे का विवरण हमारी सहयोगी विजयलक्ष्मी से सुनिए।
उन दिनों के ओबी वैन आज की तरह के बेतार कार्डलेस न होकर तार वाले होते थे। कहीं न कहीं से बिजली का जुगाड़ करना होता था। पता नहीं क्या हुआ कि विजयलक्ष्मी जी का सम्पर्क रेडियो स्टेशन से नहीं हो पाया। विजयमाने साहब ने कहा, मनोहर१ आप अपनी कॉमेंट्री चालू रखिए। पता नहीं ईश्वर ने मुझे क्या सदबुद्धि दे रखी थी कि पोप के आगमन से पहले मैंने न केवल पूरी बाइबिल पढ़ डाली थी, बल्कि अपने हिसाब से कुछ महत्वपूर्ण चीजों के नोट्स भी बना लिए थे। यह भी पढ़ रखा था कि धर्म(सभा किस तरह होती है, उसके रस्मो रिवाज क्या होते हैं। आगे सभा(स्थल से दलबीर सिंह परमार भी नहीं जुड़ पाए और मैं हवाई अड्डे के टॉवर से सभा स्थल की लाइवू रिपोर्टिंग करता रहा। अगले ही दिन से पूरे श्रीलंका से मेरे नाम ढेर सारे खत आते रहे कि मैंने किस तरह धर्मगुरु की छवि को साकार कर दिया। इसी दिन मुझे मालूम हुआ कि आँखों देखा हाल सिर्फ बाहर की आँखों से नहीं, बल्कि भीतर की आँखों से भी देखकर सुनाया जा सकता है। जो पढ़ाई और तैयारी मैंने की थी, वह बेकार नहीं गयी।
यह अनुभव अपोलो ज्ञज्ञ के मामले में भी काम आया। मैं लगातार अंतरिक्ष यात्राओं का वर्णन पढ रहा था। इसमें प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी और हिंदी के तकनीकी शब्दों को मैंने याद कर लिया था। नील आर्म स्ट्रांग वगैरह के नाम रट लिए थे। अमेरिकन काउंसलेट की बुलेटिन में काफी हद तक विवरण मिल ही जाता था। खाली समय के लिए हिंदी(उर्दू के चाँद वाले गाने तो थे ही। लेकिन यह सारी तैयारी घण्टे(दो घण्टों की ही थी और पहले साफ तौर पर मना कर देने वाले जयवीरा साहब ही अब कह रहे थे कि हमें चाँद के पहुँचने तक कॉमेंट्री जारी रखनी है। ूकैन यू डू इटरुू मैंने ओखली में सिर रख दिया था। अब मुझे लगातार पाँच(छह दिनों तक रनिंग कॉमेंट्री करनी थी। मेरे हाथ(पाँव फूलने लगे थे।
जयवीरा साहब ने आश्वस्त किया कि मुझे हर मुमकिन सहायता दी जाएगी। हरेक विभाग के कर्मचारियों को मेरी मदद के लिए झोंक दिया।अगले छः दिनों के लिए अपना बोरिया बिस्तर स्टूडियो में ही डाल दिया। एक तरह से मैं भी तभी आराम करता, जब अंतरिक्ष(यात्री आराम करते। दिन भर अमेरिकन काउंसलेट से हासिल बुलेटिन को उसी तरह पढ़ता, जैसे साल भर आवारागर्दी करने वाले लड़के इम्तहान से एक दिन पहले रट्टा मारते हैं। सिर्फ छोटी बड़ी शंकाओुं के लिए स्टूडियो से बाहर निकलता और इतने समय के लिए विजयलक्ष्मी या दलबीर मोर्चे पर तैनात हो जाते।
आँखों देखा हाल सुनाने के लिए मैंने एक तरह से ुडबिंगु वाली तकनीक ही अपनाई थी, जिसका मुझे पहले से कोई अनुभव नहीं था। टेक्निकल स्टाफ मुझे वॉयस ऑफ अमेरिकाु की कॉमेंट्री हेडफोन पर मुहैया करा देता। फीडर के जरिए मैं इसे प्रसारित भी कर सकता था। मैंने यही किया। पार्श्व में वॉयस ऑफ अमेरिकाु की आवाज बहुत धीरे धीरे बजती और मैं अपनी आवाज़ इसमें सुपर इम्पोजु कर देता। इसमें थोड़ी तकनीक थी, थोड़ी पढ़ाई थी, थोड़ा श्रम था, थोड़ी तात्कालिक बुद्धि थी, थोड़ी चतुराई थी और थोड़ा फरेब भी था। सुनने वालों को कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं मौका वारदात पर नहीं हूँ। वॉयस ऑफ अमेरिकाु के अलावा सिर्फ रेडियो सिलोन ही था जो इस घटना को कवर कर रहा था।
अभियान का छठा दिन कयामत का दिन था। अपोलो 11 के मुख्य यान से चंद्र यान को अलग होना था। चंद्र यान में नील आर्मस्ट्रॉन्ग और एडविन एल्ड्रिन थे, जबकि माइकल कॉलिन्स को मुख्य यान पर ही रुकना था। मुख्य यान से चंद यान को अलग करना मशक्कत का काम था। इस काम में काफी वक्त लग गया तो जमीन पर स्थित नियंत्रण कक्ष ने चंद्र(यात्रियों से कहा कि 8 घण्टे आराम कर लें और उसके बाद ही चाँद पर उतरें। हमें लगा कि अभी 8 घण्टों तक कुछ नहीं होगा, तो हमने भी प्रसारण बंद कर दिया। मैं घर चला आया और अभी कपड़े बदल ही रहा था कि गाड़ी का तेज हॉर्न सुनाई दिया। गाड़ी में परमार साहब थे।

मुझे फौरन से पेश्तर वापस कूच करने को कहा। बस इतना बताया कि उधर कुछ हलचल वापस तेज हो गयी हैं। आपकी जरूरत है। लौटकर कानों में हेडफोन डाला तो चन्द्रयान बस उतरने की तैयारी में था। असल में अंतरिक्ष यात्रियों ने आराम करने से मना कर दिया था। उनके सब्र का बांध टूट गया था और वे 8 घण्टे इंतज़ार के मूड में नहीं थे। काफी बहस और ना(नुकुर के बाद उन्हें इज़ाज़त दे दी गई। इधर रेडियो सिलोन का सारा स्टाफ हमारे पीछे स्टूडियो के ठीक बाहर इकठ्ठा हो गया था। आखिरकार नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने सबसे पहले चाँद पर कदम रखा। वायस ऑफ अमेरिकाू के विवरणकार उत्तेजना में थे। वे मुहावरेदार अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे थे। मैंने अपने लहजे में यह सूचना प्रसारित की और पीछे इकठ्ठा हुए मेरे सहयोगी तालियाँ बजाने लगे।
नील आर्मस्ट्रांग ने कहा, यहाँ मेरा एक छोटा(सा कदम मुकम्मल इंसान के लिए तरक्की की छलाँग है। चाँद से ज़मीं चाँद से भी खूबसूरत नजर आती है। – दिनेश चौधरी
(संस्मरण मनोहर महाजन की सुरीली दास्तानू की नवीं कड़ी है और उनसे बातचीत पर आधारित है। मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजनु से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)

Facebook Comments Box